सोमवार, 14 मई 2012

संसद ने ६० साल पूरे कर ही लिए

हमारे देश की संसद ने ६० साल पूरे कर ही लिए आख़िर | बड़ी खुशी हुई ये समाचार देखकर की लोग अभी भी उम्मीद कर रहे हैं की ये अभी और भी बहुत दिन तक काम करता रहेगा और नेताओं की झोलियों को भरने में मददगार साबित होता रहेगा, मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ की इन आशावान नेताओं की मदद करे |

हमारे प्रधानमंत्री जी ने तो कहा की भारत अभी भी पूर्ण लोकतन्त्र नहीं बन पाया है, कुछ समझ नहीं आया मुझे इस बात पर फिर मेरे दिमाग़ में ख्याल आया की कम विकसित लोकतन्त्र मतलब कम कमाई और पूर्ण मतलब जनता का सारा पैसा अपने जेब में | एक कठपुतली प्रधानमंत्री के बयान का इससे अच्छा मतलब क्या निकाला जा सकता है |

मुझे तो ये समझ में नहीं आता की ये नेता लोग कागज देखकर क्यूँ भासन देते हैं, क्या इनके कुछ स्वयं के विचार नहीं होते? जनता तो इनको वोट देती है तो फिर ये लोग दूसरों के द्वारा तय किया हुआ लेख क्यूँ पढ़ते हैं जनता के सामने | इसी बात पर मैं थोड़ा प्रकाश डालूँगा, वास्तव मैं होता क्या होगा मैं एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करूँगा अगली पंक्तियों में | एक बार कांग्रेस के माई बाप लोगों ने सोचा की कल प्रधानमंत्री द्वारा एक भासन करवा देते हैं क्यूंकी लोग आजकल बोलने लगे हैं की ये प्रधानमंत्री कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली बन गया है और कभी कुछ बोलता दिखाई नहीं देता है | तुरत फुरत में एक कागज लिख कर तैयार कर दिया गया, जिसमें देश की जनता को हज़ार घोटालों के बावजूद बेहतर अर्थव्यस्था का वादा था, यद्यपि रोकना असंभव मान चुके थे लेकिन महँगाई को रोकने का वादा था और इस लेख को आकाओं की सहमति भी मिल गयी | लेकिन तभी लोगों को ख्याल आया की कहीं संसद में भासन के बीच भाजपा के नेता हल्ला ना करने लगें नहीं तो ये काम तो बीच में ही लटक जाएगा तो उन्होने विपक्ष के आकाओं की सहमति के लिए भी वो कागज भेज दिया और उन्होने मुआयना करके कहा की इस भासन में तो विपक्ष का कोई विरोध ही नहीं है, विपक्ष को कोई गालियाँ ही नहीं दिया है कहीं जनता उन्हे चोर चोर मौसेरे भाई ना समझ ले तो फिर भासन में विपक्ष के खिलाफ भी दो चार पंक्तियाँ जोड़ डी गयीं | अगले दिन हमारे देश के प्रधानमंत्री जी ने वो कागज पढ़ा और जिंदगी भर के अपने पढ़ाई का सार प्रस्तुत किया यद्यपि जनता और अर्थशास्त्रियों को कुछ भी समझ में नहीं आया |

आपको लगता होगा इस उदाहरण से की पक्ष और विपक्ष एक साथ कैसे हो सकते हैं, मुझे भी ऐसे ही लगता था लेकिन पिछले कुछ दिनों से जो हो रहा है उससे तो यही लग रहा है | अब देखिए ना बाबा रामदेव का विरोध करना हो या अन्ना हज़ारे का, पक्ष विपक्ष साथ दिखाई देते हैं जैसे एक ही माँ के बच्चे हों और वो माँ भारत माता तो कभी नहीं हो सकती क्यूंकी भारत माता के बच्चे तो ग़रीबी से ग्रस्त हैं, भ्रस्ताचार से त्रस्त हैं, इनकी जननी तो कोई और ही है | मैं रामदेव या अन्ना का समर्थक कोई व्यक्तिवादी नहीं हूँ, मैं तो रास्ट्रवादी विचारधारा का समर्थक हूँ |

६० साल हो गये संसद को काम करते हुए और सरकारें हमेशा ही अपने स्वार्थ के लिए नित नये क़ानून बनाती गयीं, कभी विपक्ष का मुँह बंद करने के लिए क़ानून तो कभी वोट के लिए जाति या आरक्षण से संबंधित क़ानून | अरे भाई कभी तो जनता के हित के ळिए क़ानून बनाए कोई, अरे अँग्रेज़ों की औलादों कभी तो ये फूट डालो राज करो या विरोधियों का दमन करना भूलकर जनता के हित का सोचो जिसने तुम पर भरोसा किया |

अब बात करते हैं राजनीतिक माहौल की जहाँ पर गाँधी का नाम लोग देश की जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए प्रयोग करते हैं लेकिन उनका वास्तविक नाम कुछ और ही होता है | इस राजनीति में लोग युवा नेतृत्व को आगे आने का आवाह्न करते हैं लेकिन आगे आता है एक नेता की औलाद बाकी लोग तो दबा दिए जाते हैं गुण्डों द्वारा, इस नेता की औलाद को कोई ज़रूरत नहीं होती इस आवाह्न की क्यूंकी पढ़ने लिखने में कमजोर, सारे कुकार्मों से मंडित एक दुराचारी व्यक्ति के लिए बाप के चमचोन की मदद से यही एक रास्ता होता जो सर्व सुलभ होता है |

अब देश के युवा जो राजनीति में जाने के इच्छुक हैं, इनको कौन समझाए की नेताओं का चमचा बनने के अलावा भी रास्ते हैं ?  देश की जनता को कौन समझाए की कांग्रेस के राजनीतिक सफ़र को भारत के १५० साल के स्वतंत्रता संग्राम के समकक्ष ना रखें ?  कौन समझाए आधुनिक होती युवा पीढ़ी को की जिस संस्कार और संस्कृति की अवमानना करके वे अपने आपको आधुनिक समझते हैं, उसी की वजह से हमारा विश्व में स्थान है ?  और मैं भी अब क्या क्या लिखूं ?